शीर्षकहीन


एक पेड़ खिड़की से दिखता था
मचलता झूलता हमेशा नज़र आता था

पर बाहर जब भी मैं जाता था
शांत होकर खड़ा हो जाता था

वापिस अंदर आने पर मेरे
फिर अपना नाच शुरू कर देता था

ये सिलसिला काफी दिन चला
और थमने का नाम नहीं लिया

एक दिन मैंने खिड़की तोड़ दी
और फिर कभी बाहर नहीं देखा

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