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Showing posts from July, 2016

फिर वही

याद है मझे
बारिश बनकर तुम पहले भी आई थी
हर साल नहीं हर मौसम नहीं
पर कभी तोह आई थी

इस बार भी शायद तुम आओगी
पर तुम नहीं  जानती
जाना मुझे दूर है
रुकना तुम्हारा भी कहाँ दस्तूर है

इसलिए सोचता हूँ
थोड़ा डरता हूँ
दरवाज़े ढाल दूँ
खिदिकियां भी बंद कर लूँ

मगर फितरत तो मेरी
उस हवा जैसी है
जो बिन कहे बिन पूछे
दरवाज़े खिड़कियां तोड़ देती है

तुम फिर बरस जाना
मैं फिर भीग जाऊंगा

IRENE

A candle
That spoke in your voice
Ignited our room every night
By the distance of our distance

As sweat fuelled the candle
The flame became a fire
And we became shadows
Dancing on the walls

We removed our black stars
And put out every white one
In the sky
Until it was dark

A grey wax drop
Now speaks in your absence
Douses that room every day
By the distance of our distance